लोक अदालत ने बिना समझौते दे दी राहत, हाईकोर्ट ने 2014 का अवॉर्ड किया रद्द; अब लेबर कोर्ट में फिर होगी सुनवाई

बिलासपुर, 16 सितंबर 2026। ठेका कर्मचारी की काम के दौरान हुई मौत के बाद मुआवजे से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लोक अदालत के करीब 12 साल पुराने अवॉर्ड को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक अदालत की कार्यवाही पक्षकारों के बीच समझौते और सहमति पर आधारित होती है। यदि पक्षकारों के बीच समझौता नहीं हुआ है, तो लोक अदालत अपने स्तर पर किसी पक्ष को राहत देकर मामले का अंतिम निपटारा नहीं कर सकती।
हाईकोर्ट ने वर्ष 2014 में लोक अदालत द्वारा पारित अवॉर्ड को रद्द करते हुए मामले को संबंधित लेबर कोर्ट में वापस भेजने का निर्देश दिया है। साथ ही नए सिरे से सुनवाई कर मामले का फैसला पांच महीने के भीतर करने को कहा है।

CSPDCL ने लोक अदालत के फैसले को दी चुनौती
मामला छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (CSPDCL) से जुड़ा है। कंपनी की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर लोक अदालत के उस अवॉर्ड को चुनौती दी गई थी, जिसके जरिए ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से राहत मिली थी।
CSPDCL की ओर से तर्क दिया गया कि कर्मचारी की मौत काम के दौरान हुई थी और मुआवजा देने की जिम्मेदारी संबंधित ठेकेदार की थी। इसके बावजूद लोक अदालत ने ठेकेदार को राहत दे दी।

समझौता नहीं तो लोक अदालत नहीं कर सकती अंतिम फैसला
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने लोक अदालत की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि लोक अदालत का आधार ही पक्षकारों के बीच आपसी समझौता है।
यदि दोनों पक्षों के बीच समझौता नहीं होता है, तो लोक अदालत को अपने स्तर पर विवाद का फैसला कर किसी पक्ष को राहत देने का अधिकार नहीं है। ऐसी स्थिति में मामला उसी न्यायालय या संबंधित फोरम को वापस भेजा जाना चाहिए, जहां से उसे लोक अदालत में भेजा गया था।

2014 का अवॉर्ड हुआ रद्द
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर 2014 में पारित लोक अदालत के अवॉर्ड को निरस्त कर दिया। अदालत ने मामले को संबंधित लेबर कोर्ट में वापस भेजते हुए नए सिरे से सुनवाई के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि मामले की दोबारा सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर पांच महीने के भीतर निर्णय लिया जाए।
कर्मचारी की मौत के बाद मुआवजे पर शुरू हुआ था विवाद
यह विवाद एक ठेका कर्मचारी की काम के दौरान हुई मौत के बाद शुरू हुआ था। कर्मचारी के परिजनों ने मुआवजे की मांग की थी। वहीं, CSPDCL की ओर से मुआवजे की जिम्मेदारी संबंधित ठेकेदार की होने का पक्ष रखा गया था।
मामला लोक अदालत पहुंचा, लेकिन हाईकोर्ट के अनुसार पक्षकारों के बीच आवश्यक सहमति के बिना ही अवॉर्ड पारित कर दिया गया। अब उस अवॉर्ड के निरस्त होने के बाद मुआवजे के मूल विवाद पर लेबर कोर्ट में नए सिरे से सुनवाई होगी।








