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हरेली में दिखेगा छत्तीसगढ़ी संस्कृति का रंग: किसान पूजेंगे कृषि औजार, गोधन को खिलाएंगे गहूंता, गांवों में होंगी पारंपरिक प्रतियोगिताएं

छत्तीसगढ़ी संस्कृति में लोक-त्योहारों की समृद्ध परंपरा रही है। इन पर्वों में प्रकृति, कृषि और जीव-जंतुओं के प्रति गहरा सम्मान और कृतज्ञता का भाव दिखाई देता है। इन्हीं लोक-पर्वों में सबसे पहला और प्रमुख त्योहार है—हरेली तिहार। सावन माह की अमावस्या, जिसे हरियाली अमावस्या भी कहा जाता है, को मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ के लोकजीवन, कृषि परंपरा और पर्यावरण-प्रेम का जीवंत प्रतीक है।

छत्तीसगढ़ की पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं से भी है। प्रदेश के लोकजीवन में पर्व और त्योहारों की बहुलता है। प्रत्येक माह कोई न कोई पर्व लोकमानस को अपने रंग में रंग देता है। ये त्योहार जहां लोकजीवन में हंसी-खुशी के अवसर उपलब्ध कराते हैं, वहीं खेल, मनोरंजन और सामाजिक सहभागिता के लिए भी अनुकूल वातावरण निर्मित करते हैं।

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प्रकृति का हरापन छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में भी पूरी तरह समाहित है। हरेली, भोजली, जंवारा हो या बसंत पंचमी—इन सभी पर्वों में प्रकृति का मनोरम रूप और उसका अप्रतिम सौंदर्य झलकता है। इन पर्वों में जीवन की विभिन्न अवस्थाओं का उल्लास और उत्साह विविध रंगों में बिखरा दिखाई देता है।

शायद ‘हरेली’ का हरापन हमारी परंपराओं, संस्कारों और लोकजीवन में प्राकृतिक हरीतिमा का सबसे गहरा एहसास कराता है। कामना है कि हरेली का यह हरापन हर व्यक्ति के जीवन में बिखरे और निखरे। साथ ही हमारी पारंपरिक खेल संस्कृति जीवित रहे, ताकि माटी से जुड़े ग्रामीणजन शारीरिक और मानसिक रूप से सुदृढ़ रहें। माटी की सोंधी महक लोकगीतों से आती रहे और खेल परंपरा की यह अविरल धारा निरंतर गतिमान रहे।

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हरेली शब्द का अर्थ और महत्व

‘हरेली’ शब्द ‘हरियाली’ से बना माना जाता है। सावन के महीने में जब खेत-खलिहान और मैदान हरियाली से भर उठते हैं, फसलें लहलहाने लगती हैं और प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है, तब किसान हरेली तिहार को उल्लास के साथ मनाते हैं।

हरेली को छत्तीसगढ़ का पहला तिहार माना जाता है। यहीं से प्रदेश के प्रमुख लोक-पर्वों की श्रृंखला शुरू होती है। यह पर्व किसान और प्रकृति के बीच सदियों पुराने आत्मीय संबंध का प्रतीक है।

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कृषि उपकरणों और पशुधन की पूजा

हरेली का दिन कृषकों और कृषि से जुड़े साधनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। छत्तीसगढ़ में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है।

कृषि उपकरणों की पूजा

हरेली की जड़ें छत्तीसगढ़ की कृषि विरासत में गहराई से जुड़ी हुई हैं। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, वर्षा और कृषि कार्य के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है।

इस दिन किसान अपने कृषि उपकरणों—हल, फावड़ा, कुदाल, कुदाली, कुम्हड़ी, बिंधना, बसुला, हथौड़ी, आरी, असिया, पैसुल, छूरा, खुर्पी आदि को धोकर साफ करते हैं। इसके बाद स्वच्छ मिट्टी या मुरमी से आसन तैयार कर पूजा सामग्री रखी जाती है।

किसान-किसानिन धुले हुए चावल के आटे से ‘हाथा’ लगाते हैं और चंदन, फूल, धूप-दीप तथा चीला-रोटी का भोग लगाकर श्रीफल अर्पित करते हैं। पूजा के दौरान कृषि उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनसे अगले कृषि वर्ष में सहयोग और समृद्धि की कामना की जाती है।

यह परंपरा इस भाव को अभिव्यक्त करती है कि किसान के लिए उसका हल और कृषि उपकरण केवल निर्जीव वस्तुएं नहीं, बल्कि खेती-किसानी के सच्चे सहयोगी हैं। लंबे समय तक कठिन परिश्रम करने वाले इन साधनों को हरेली के दिन विश्राम देकर सम्मानित किया जाता है।

पशुधन का सत्कार

कृषि व्यवस्था में पशुधन का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत में मिश्रित कृषि प्रणाली के अंतर्गत फसल और पशुधन एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं।

बैल छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कृषि व्यवस्था की रीढ़ रहे हैं। विशेषकर सीमांत और लघु किसान जुताई, ढुलाई तथा कृषि सामग्री के परिवहन के लिए बैलों पर निर्भर रहे हैं।

हरेली के दिन गाय और बैलों को विशेष रूप से नहलाया-धुलाया जाता है। उनकी आरती उतारी जाती है और उन्हें पारंपरिक रूप से तैयार पौष्टिक मिश्रण ‘गहूंता’ खिलाया जाता है। कई क्षेत्रों में स्थानीय परंपरा के अनुसार जड़ी-बूटियों से तैयार औषधीय मिश्रण भी पशुओं को दिया जाता है।

इस परंपरा में अरण्ड और खम्हार जैसे पेड़ों की पत्तियों के साथ नमक तथा चावल या गेहूं के गोले का उपयोग किए जाने का उल्लेख मिलता है। ग्रामीण जीवन में यह पशुधन को स्वस्थ रखने और मौसमी रोगों से बचाने की पारंपरिक समझ का हिस्सा रहा है।

हरेली की परंपराएं और रीति-रिवाज

गेड़ी चढ़ने का आनंद

हरेली तिहार में गेड़ी का विशेष महत्व है। बांस के मोटे डंडों और बांस के ‘पहुये’ को विशेष तरीके से बांधकर गेड़ी तैयार की जाती है। बारिश के मौसम में कीचड़ और पानी से भरे रास्तों पर चलने की जरूरत से जुड़ी इस परंपरा ने समय के साथ मनोरंजक खेल का रूप ले लिया।

गेड़ी पर चढ़ना बच्चों और युवाओं के लिए आज भी आकर्षण का केंद्र रहता है। कई स्थानों पर गेड़ी दौड़, एक पैर पर खड़े होने, एक पैर से कूदने और अन्य पारंपरिक खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।

लोक परंपराओं में बलदाऊ और कृष्ण के गेड़ी चढ़ने के प्रसंगों का भी उल्लेख मिलता है। इस तरह गेड़ी केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि लोक-स्मृति और खेल संस्कृति से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा है।

खेल और प्रतियोगिताओं का आयोजन

हरेली के अवसर पर गांवों और शहरों में विभिन्न पारंपरिक खेलों और प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इनमें नारियल फेंक प्रतियोगिता, गेड़ी दौड़, खो-खो, फुगड़ी, बिल्लस, अत्ती-पत्ती और डंडा-पचरंगा जैसे पारंपरिक खेल शामिल हैं।

पूजा-अर्चना के बाद गांव के चौक-चौराहों और मैदानों में युवाओं की टोलियां जुटती हैं। कहीं गौठान खेल का मैदान बन जाता है तो कहीं स्कूल परिसर या गांव का चौक पारंपरिक खेलों का केंद्र बन जाता है।

हरेली के दिन ग्रामीण परिवेश में उत्सव का अलग ही रंग दिखाई देता है। लोग पारंपरिक और रंग-बिरंगे परिधानों में सजते हैं और सामूहिक रूप से त्योहार का आनंद लेते हैं।

नीम की पत्तियों से सुरक्षा की मान्यता

हरेली से जुड़ी कई लोकमान्यताएं स्वास्थ्य और सुरक्षा से भी संबंधित हैं। मान्यता के अनुसार इस दिन घरों के मुख्य दरवाजों पर नीम की पत्तियां लगाई जाती हैं।

कई क्षेत्रों में लोहार द्वारा घर के चौखट पर नीम की शाखाएं और लोहे की कीलें लगाने की परंपरा भी रही है। लोकविश्वास में इसे घर को बुरी नजर, नकारात्मक शक्तियों और बीमारियों से बचाने वाला माना जाता है।

नीम के औषधीय गुणों के कारण ग्रामीण स्वास्थ्य परंपराओं में इसका विशेष महत्व रहा है। इस तरह हरेली से जुड़ी कई परंपराओं में लोकविश्वास के साथ-साथ प्रकृति और पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान का समन्वय भी दिखाई देता है।

हरेली के पारंपरिक व्यंजन

हरेली तिहार का आनंद पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजनों के बिना अधूरा माना जाता है। इस अवसर पर घरों में गुड़ का चीला, अईरसा, चौसेला, बोबरा, गुलगुला भजिया, गुड़हा चीला, सोहारी, बड़ा, ठेठरी और खुरमी जैसे पकवान बनाए जाते हैं।

इन व्यंजनों को परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के बीच बांटा जाता है। कई स्थानों पर कृषि उपकरणों और पशुधन को भी पारंपरिक रूप से पकवानों का भोग लगाया जाता है।

इस तरह हरेली केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि स्वाद, सामूहिकता और पारिवारिक मेल-मिलाप का भी त्योहार है।

प्रकृति और लोकजीवन के बीच अटूट रिश्ता

हरेली तिहार केवल धार्मिक या लोक-अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य और प्रकृति के बीच सदियों से चले आ रहे अटूट संबंध को दर्शाता है।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारी खेती, भोजन और जीवन प्रकृति पर निर्भर हैं। खेतों में हरियाली लाने वाली बारिश, फसल उगाने वाली मिट्टी, खेती में सहयोग करने वाले पशुधन और कृषि उपकरणों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारी लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हरेली हमें यह संदेश भी देता है कि विकास की दौड़ के बीच हमें अपनी जड़ों, परंपराओं और प्रकृति के साथ अपने संबंध को नहीं भूलना चाहिए।

पारंपरिक खेलों को सहेजने का संदेश

आज जब आधुनिक मनोरंजन के साधन तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे समय में हरेली जैसे पर्व पारंपरिक खेलों और लोक संस्कृति को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं।

छत्तीसगढ़ में हरेली के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश और पारंपरिक खेलों को प्रोत्साहन देने जैसी पहल से इस लोक-सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर मिलता है।

हरेली की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि इसमें माटी, मनुष्य, प्रकृति, पशुधन, कृषि और लोक संस्कृति एक साथ दिखाई देते हैं। यह पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है और बताता है कि समृद्धि केवल खेतों की हरियाली में नहीं, बल्कि हमारी परंपराओं और संस्कारों के संरक्षण में भी है।

कामना है कि हरेली का हरापन हमारे खेत-खलिहानों के साथ-साथ हमारे जीवन, विचारों और संस्कारों में भी सदैव बना रहे। छत्तीसगढ़ की माटी की सोंधी खुशबू हमारे लोकगीतों में गूंजती रहे, पारंपरिक खेलों की धारा अविरल बहती रहे और आने वाली पीढ़ियां अपनी इस समृद्ध लोक विरासत पर गर्व करती रहें।

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